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भारत का घरेलू कोविड-19 टीकाकरण अभियान: 2.2 अरब डोज़, एक गंभीर दूसरी लहर, और मृतक संख्या पर अनसुलझा सवाल

प्रकाशित: 15 सित॰ 2026

जन॰ 2020मार्च 2023

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भारत में लगाई गई संचयी कोविड-19 वैक्सीन डोज़

15 जनवरी 2021 (अभियान शुरू होने से एक दिन पहले)
0
4 मार्च 2023 (संचयी कुल)
2.2 अरब+ (220 करोड़+) डोज़
पूर्ण रूप से टीकाकृत लोग (2 डोज़), योग्य आबादी का ~87.8%
952,033,158

दूसरी लहर के शिखर के दौरान संचयी आधिकारिक कोविड-19 मौतें

~28 अप्रैल 2021 (300,000 के आंकड़े से 26 दिन पहले)
~200,000
24 मई 2021
300,000+
उस एक 26-दिन की अवधि में दर्ज मौतें
~100,000

कोविड-19 मृतक संख्या: आधिकारिक आंकड़ा बनाम स्वतंत्र अतिरिक्त-मृत्यु अनुमान

आधिकारिक संचयी आंकड़ा, भारत सरकार (कुल, जैसा दर्ज है)
533,849
भारत के लिए WHO का अतिरिक्त-मृत्यु अनुमान, 2020-2021 (5 मई 2022 को जारी रिपोर्ट)
~4.7 मिलियन (लगभग 47 लाख)
स्वतंत्र अकादमिक अनुमान सीमा (सेंटर फ़ॉर ग्लोबल डेवलपमेंट, 3 अलग तरीके, जुलाई 2021)
3.4 मिलियन – 4.9 मिलियन

भारत ने अपनी ही बनाई दो वैक्सीनों से 2.2 अरब डोज़ लगाई और करोड़ों लोगों को मुफ़्त टीका दिया — लेकिन 2021 की दूसरी लहर में ऑक्सीजन और बेड की भारी कमी झेली, और आधिकारिक मृतक संख्या को लेकर WHO व स्वतंत्र अध्ययनों से बड़ा मतभेद अब भी अनसुलझा है।

घर में ही दो वैक्सीन बनाना और लगाना

भारत का टीकाकरण अभियान 16 जनवरी 2021 को शुरू हुआ, जिसमें उस महीने की शुरुआत में भारत के औषधि महानियंत्रक (DCGI) द्वारा मंज़ूर की गई दो वैक्सीनों का उपयोग हुआ: कोविशील्ड, जो ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका फ़ॉर्मूला है और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया द्वारा लाइसेंस के तहत बनाई गई, और कोवैक्सीन, जो भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ भारत बायोटेक द्वारा घरेलू स्तर पर विकसित की गई — भारत की अपनी पहली स्वदेशी रूप से विकसित कोविड-19 वैक्सीन। कोवैक्सीन को आपातकालीन मंज़ूरी उसके फ़ेज़-3 ट्रायल पूरी तरह खत्म होने से पहले ही दी गई थी, जिस फ़ैसले की उस समय सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने समय से पहले होने की आलोचना की थी, हालांकि बाद में पूरे हुए ट्रायल आंकड़ों में वैक्सीन की प्रभावशीलता साबित हुई। कोविन डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने देशभर में पंजीकरण और अपॉइंटमेंट शेड्यूलिंग का प्रबंधन किया, शुरुआत में सिर्फ़ ऑनलाइन पंजीकरण के साथ 3,006 केंद्रों से हुई, और 23 मई 2021 से वॉक-इन पंजीकरण (स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा सीधे सिस्टम में लोगों को दर्ज करना) जोड़ा गया, क्योंकि शुरुआती डिजिटल-पंजीकरण की ज़रूरत ने स्मार्टफ़ोन या भरोसेमंद इंटरनेट न रखने वाले लोगों को, ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में, नुकसान में डाल दिया था।

पैमाना: आंकड़े क्या बताते हैं

4 मार्च 2023 तक, भारत में कुल मिलाकर 2.2 अरब (220 करोड़) से ज़्यादा वैक्सीन डोज़ लगाई जा चुकी थीं। इनमें से अनुमानित 1,025,789,302 लोगों (योग्य आबादी का लगभग 94.6%) को कम से कम एक डोज़ मिली, 952,033,158 लोगों (लगभग 87.8%) को दो डोज़ के साथ पूर्ण टीकाकरण हुआ, और इसके अतिरिक्त 228,593,024 एहतियाती/बूस्टर डोज़ें दी गईं। पूरे अभियान के दौरान वैक्सीन सरकारी केंद्रों पर मुफ़्त उपलब्ध रही, जिसकी लागत केंद्र सरकार ने वहन की।

व्यक्तिगत स्तर: घर के पास मुफ़्त डोज़, पर हमेशा वक़्त पर नहीं

ज़्यादातर भारतीय परिवारों के लिए वास्तविक अनुभव यह था कि उन्हें नज़दीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र या शिविर में बिना किसी लागत के वैक्सीन डोज़ मिली — न कोई निजी अस्पताल का बिल, न दूर जाने की ज़रूरत, और (मई 2021 के बाद) अपॉइंटमेंट के लिए ऐप चलाने या स्मार्टफ़ोन रखने की ज़रूरत भी नहीं। यह उस स्थिति से एक असली, रोज़मर्रा का फ़र्क़ था जहां टीकाकरण निजी खरीद या सिर्फ़ शहरी उपलब्धता पर निर्भर होता। लेकिन वही सामान्य परिवार अभियान शुरू होने के कुछ ही महीनों बाद इस कहानी के दूसरे पहलू से भी गुज़रे: अप्रैल-जून 2021 की दूसरी लहर के दौरान, कई परिवारों ने अपने किसी बीमार रिश्तेदार के लिए अस्पताल का बेड, ऑक्सीजन सिलेंडर या जीवन-रक्षक दवा निजी संपर्कों और सोशल मीडिया के ज़रिए ढूंढी, क्योंकि उनके शहर में औपचारिक व्यवस्था इतनी तेज़ी से यह सब मुहैया नहीं करा पा रही थी। यह दोनों अनुभव एक ही दौर का हिस्सा हैं और एक ही ईमानदार लेखे-जोखे में आने चाहिए।

दूसरी लहर: एक गंभीर, दर्ज संकट (अप्रैल-जून 2021)

2020 की भारत की पहली कोविड लहर के बाद डेल्टा वेरिएंट से प्रेरित एक कहीं ज़्यादा गंभीर दूसरी लहर आई। 30 अप्रैल 2021 को राष्ट्रीय स्तर पर रोज़ाना नए मामले 400,000 के पार चले गए, और उसी दिन 3,500 से ज़्यादा मौतें दर्ज हुईं — जो उस समय तक दुनियाभर में महामारी के दौरान दर्ज सबसे ऊंचे एक-दिनी आंकड़ों में शामिल था। स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव गंभीर था और अच्छी तरह दर्ज है: कई बड़े शहरों में अस्पतालों की मांग के अनुसार तरल मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं मिल पा रही थी, और यह कमी ऑक्सीजन को ज़रूरत की जगह तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त क्रायोजेनिक टैंकरों की कमी से और बढ़ गई थी; दिल्ली समेत कई शहरों के अस्पतालों ने गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों को लौटाया या परिवारों से खुद ऑक्सीजन का इंतज़ाम करने को कहा। संकट इतना गंभीर था कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 9 मई 2021 को राज्यों के बीच ऑक्सीजन आवंटन का समन्वय करने के लिए विशेष रूप से एक राष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स बनाई। 24 मई 2021 तक आधिकारिक संचयी मौतें 300,000 के पार पहुंच गईं — जिनमें से लगभग 100,000 मौतें सिर्फ़ पिछले 26 दिनों में दर्ज हुई थीं, जो यह दिखाता है कि संकट कितनी तेज़ी से बढ़ा। कई शहरों में श्मशान घाट और कब्रिस्तान हफ़्तों तक अपनी क्षमता से कहीं ज़्यादा भार पर काम करते रहे। इस दौरान भारत को अन्य देशों से आपातकालीन ऑक्सीजन-संबंधी सहायता और उपकरण भी मिले। यह प्रविष्टि इस कमी के लिए किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं करती — ऊपर दिए गए तथ्य दर्ज घटनाओं के रूप में बताए गए हैं, किसी कारण को लेकर कोई फ़ैसला नहीं।

मृतक संख्या पर विवाद: आधिकारिक आंकड़ा बनाम स्वतंत्र अनुमान

भारत का आधिकारिक संचयी कोविड-19 मृतक आंकड़ा 533,849 है। कई स्वतंत्र प्रयासों ने इसी अवधि के लिए काफ़ी ज़्यादा अतिरिक्त-मृत्यु (excess mortality) का अनुमान लगाया है, और इन आंकड़ों के बीच का अंतर खुद एक दर्ज, अनसुलझा विवाद है — किसी एक दिशा में तय सच्चाई नहीं। जुलाई 2021 में, आनंद, सैंडेफ़ुर और सुब्रमण्यन के एक सेंटर फ़ॉर ग्लोबल डेवलपमेंट कार्यपत्र ने तीन अलग-अलग तरीकों का उपयोग किया — सात राज्यों के सिविल रजिस्ट्रेशन आंकड़ों से अनुमान निकालना, भारतीय सीरोप्रिवेलेंस आंकड़ों पर अंतरराष्ट्रीय उम्र-विशिष्ट संक्रमण-मृत्यु दर लागू करना, और 800,000 से ज़्यादा लोगों के एक दीर्घकालिक घरेलू सर्वेक्षण का विश्लेषण करना — और क्रमशः 3.4 मिलियन, लगभग 4 मिलियन, और 4.9 मिलियन अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया, जो उस समय के लगभग 400,000 के आधिकारिक आंकड़े से कहीं ज़्यादा थे। 5 मई 2022 को जारी अपनी वैश्विक अतिरिक्त-मृत्यु रिपोर्ट में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अनुमान लगाया कि 2020-2021 के दौरान भारत में लगभग 4.7 मिलियन अतिरिक्त मौतें हुईं — जो अकेले उस अवधि के लिए WHO के 14.9 मिलियन के वैश्विक अतिरिक्त-मृत्यु आंकड़े का एक बड़ा हिस्सा है। भारत सरकार ने WHO के इस अनुमान पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई, यह तर्क देते हुए कि उसकी सांख्यिकीय पद्धति और एक्सट्रापोलेशन तरीके त्रुटिपूर्ण हैं और भारत के अपने सर्विलांस आंकड़ों को अधिक भरोसेमंद माना जाना चाहिए। दूसरी ओर, स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने संरचनात्मक कारण बताए हैं कि पुष्टि किए गए कोविड-19 मामलों पर आधारित एक आधिकारिक आंकड़ा भारत में मौतों को कम क्यों दिखा सकता है: भारत की रोग-सर्विलांस प्रणाली अस्पताल के बाहर होने वाली मौतों या जिन लोगों की कभी जांच नहीं हुई उनकी मौतों को दर्ज नहीं करती, और सिविल रजिस्ट्रेशन की पूर्णता राज्य-दर-राज्य बहुत भिन्न है। यह प्रविष्टि इस पर कोई पक्ष नहीं लेती कि कौन-सा आंकड़ा सच्चाई के ज़्यादा करीब है — आधिकारिक आंकड़ा और स्वतंत्र अनुमान दोनों को यहां वैसे ही उद्धृत किया गया है जैसा हर स्रोत असल में कहता है, और उनके बीच की असहमति को खुद एक तथ्य के रूप में दर्ज किया गया है।

व्यापक स्तर: घरेलू निर्माण क्षमता का भारत की आत्मनिर्भरता के लिए मतलब

भारत के विदेशों को भेजी गई वैक्सीन (जिसे वैक्सीन मैत्री पर एक अलग प्रविष्टि में शामिल किया गया है) से अलग, यह तथ्य कि भारत के अपने अभियान में इस्तेमाल हुई दोनों वैक्सीन घरेलू स्तर पर बनाई गई थीं — कोविशील्ड सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया द्वारा, जो मात्रा के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता है, और कोवैक्सीन भारत बायोटेक व ICMR का पूरी तरह स्वदेशी उत्पाद — इसका मतलब था कि भारत बिना आयातित डोज़ पर निर्भर हुए अपनी लगभग पूरी वयस्क आबादी का टीकाकरण कर सका। यह दवा-निर्माण में आत्मनिर्भरता और क्षमता का एक असली पैमाना है, जो निर्यात के लिए उसी क्षमता के कूटनीतिक इस्तेमाल से अलग और अतिरिक्त है। हालांकि, यह ऊपर बताए गए दूसरी-लहर स्वास्थ्य-क्षमता संकट या मृतक-संख्या विवाद की भरपाई नहीं करता या उसे कमतर नहीं बनाता — वैक्सीन निर्माण क्षमता और अस्पताल/ऑक्सीजन अवसंरचना क्षमता अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं, और यह प्रविष्टि दोनों को ईमानदारी से दर्ज करती है, एक को दूसरे की जगह खड़ा नहीं करती।

स्वास्थ्यकोविड-19टीकाकरणकोविन

स्रोत

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आख़िरी बार सत्यापित: 16 सित॰ 2026

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