रायमिश्रित राय
भारत ने एक दशक में 16 नए एम्स बनाए। कई को पूरा वार्ड खोलने में सालों लगे।
प्रकाशित: 15 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: 2014 से एम्स नेटवर्क 7 से 23 संस्थानों तक बढ़ा — कई अब भी पूरी क्षमता से दूर
आज़ाद भारत के इतिहास के ज़्यादातर हिस्से में, एम्स-स्तर का अस्पताल मिलने का मतलब सिर्फ़ एक पता था: दिल्ली। इसे दिल्ली से बाहर बढ़ाने की पहली कोशिश से सिर्फ़ छह और संस्थान बने, और वे भी 2012 तक जाकर ही असल में खुल पाए, इसलिए 2014 में एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाले पूरे देश में कुल मिलाकर सिर्फ़ सात एम्स थे — यानी दिल्ली के बाहर किसी भी परिवार को अगर कोई गंभीर बीमारी होती जिसके लिए उस स्तर की विशेषज्ञ देखभाल चाहिए होती, तो बीमारी के ऊपर एक लंबा, ख़र्चीला सफ़र भी जुड़ जाता। इसके बाद 16 और एम्स मंज़ूर किए गए, जिससे 2026 तक यह नेटवर्क तीन गुना बढ़कर 23 हो गया। पर सरकार के अपने संसदीय जवाबों से मिला ईमानदार रेकॉर्ड यह है कि परिसर खोलना और पूरी तरह चलता हुआ अस्पताल चलाना एक बात नहीं है: फरवरी 2023 के एक लोकसभा जवाब में कहा गया कि कई नए एम्स अब भी "संचालन के विभिन्न चरणों में" हैं, और घोषणा के सालों बाद भी सिर्फ़ सीमित OPD और IPD सेवाएं ही दे रहे हैं; और जब 2024 में इनमें से पांच को औपचारिक रूप से "देश को समर्पित" किया गया, तो हर एक पहले से सालों से आंशिक रूप से चल रहा था, कुछ मामलों में 2018 से ही। जिस परिवार को अब बहु-राज्य सफ़र के बजाय पहुंच में विशेषज्ञ देखभाल मिल गई है, उसके लिए यह विस्तार समारोह की सही तारीख़ से परे भी असली फ़ायदा है; और जो परिवार वहां पहुंचकर सीमित सेवाएं या स्वतंत्र समीक्षकों द्वारा बताई गई फैकल्टी की कमी पाता है, उसके लिए घोषणा और पूरी क्षमता के बीच का यह अंतर भी इस कहानी का उतना ही ज़रूरी हिस्सा है।
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