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तुलना

वैश्विक हथियार निर्यात में भारत की हिस्सेदारी

वैश्विक हथियार निर्यात में हिस्सेदारी (%, 2020-24)

संयुक्त राज्य अमेरिका
43%
फ्रांस
9.6%
रूस
7.8%
चीन
5.9%
जर्मनी
5.6%
भारत
0.3% से कम (शीर्ष 25 निर्यातकों से बाहर)
वैश्विक हथियार व्यापार में शीर्ष पांच निर्यातक—अमेरिका, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी—मिलकर दुनिया के कुल हथियार निर्यात का 72% हिस्सा रखते हैं (SIPRI, 2020-24 के आंकड़े)। इसके विपरीत, भारत SIPRI की शीर्ष 25 हथियार निर्यातक देशों की सूची में 2020-24 की अवधि के लिए शामिल ही नहीं है—इस सूची में 25वें स्थान पर रहे दक्षिण अफ्रीका की हिस्सेदारी भी महज 0.3% थी, यानी भारत की वास्तविक हिस्सेदारी इससे भी कम है। कुल वैश्विक हथियार व्यापार में हिस्सेदारी के इस पैमाने पर भारत अभी स्थापित हथियार-निर्माता शक्तियों की तुलना में एक बहुत छोटा खिलाड़ी है, और इसे सीधे-सीधे स्वीकार करना ज़रूरी है। यहां असली कहानी मौजूदा पैमाने की नहीं, बल्कि रुझान की है। घरेलू स्तर पर भारत का रुपए में मापा गया रक्षा निर्यात बहुत तेज़ी से बढ़ा है—एक दशक पहले लगभग ₹686 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में ₹23,622 करोड़ तक, जैसा कि इस साइट पर अन्यत्र दर्ज़ है। ब्रह्मोस मिसाइल, पिनाका रॉकेट प्रणाली और डोर्नियर विमान जैसे उत्पादों की मदद से यह एक बहुत छोटे आधार से आई वास्तविक और तेज़ वृद्धि है। लेकिन शून्य के लगभग आधार से प्रतिशत में तेज़ वृद्धि दिखना गणितीय रूप से आसान है, और यह अभी तक दसियों अरब डॉलर वार्षिक मूल्य वाले वैश्विक हथियार व्यापार में—जिसमें अमेरिका की अकेले 43% हिस्सेदारी है—किसी सार्थक हिस्से में तब्दील नहीं हुई है। इस तस्वीर का दूसरा, बराबर महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक बना हुआ है। SIPRI के अनुसार भारत 2018-22 और 2019-23 दोनों पांच-वर्षीय अवधियों में दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक था, और 2020-24 में यह केवल यूक्रेन के बाद दूसरे स्थान पर खिसका—फिर भी वैश्विक हथियार आयात में इसकी हिस्सेदारी 8.3% रही। इस अवधि में भारत के आयात का 36% रूस से और 33% फ्रांस से आया। यह याद दिलाता है कि भारत जिस समय अपना निर्यात उद्योग खड़ा कर रहा है, उसी समय वह विदेश से बेचने के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा खरीद भी रहा है—और यह असंतुलन रक्षा व्यापार की पूरी तस्वीर का ज़रूरी हिस्सा है।
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रक्षा निर्यात एक दशक में ₹686 करोड़ से रिकॉर्ड ₹23,622 करोड़ तक पहुंचा

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