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तुलना

भारत बनाम दुनिया: बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी

कुल बिजली उत्पादन में नवीकरणीय स्रोतों की हिस्सेदारी (2025)

ब्राज़ील
86.6%
जर्मनी
59.1%
चीन
37.0%
विश्व औसत
33.8%
अमेरिका
25.6%
भारत
24.1%
यह आंकड़ा भारत की नवीकरणीय ऊर्जा की एक अलग, बराबरी पर तुलना योग्य कसौटी है — स्थापित क्षमता (गीगावाट) नहीं, बल्कि यह कि वास्तव में कितनी बिजली नवीकरणीय स्रोतों से पैदा हुई। ऊर्जा थिंक-टैंक Ember के देश-वार आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारत की कुल बिजली का लगभग 24% हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों (जल, सौर, पवन, बायोएनर्जी) से आया — जो इस तुलना में शामिल छह में से सबसे कम है, और 34% के वैश्विक औसत से भी नीचे है। ब्राज़ील (87%, मुख्यतः जलविद्युत के दम पर), जर्मनी (59%, दो दशक की जानबूझकर ऊर्जा-संक्रमण नीति और 2023 में पूर्ण परमाणु-विदाई का नतीजा), चीन (37%) और यहां तक कि अमेरिका (लगभग 26%) — सभी भारत से आगे हैं। यह असहज लेकिन ईमानदार तस्वीर है, और इसे छिपाने की बजाय समझने की ज़रूरत है। भारत की समस्या नीयत की नहीं, संरचना की है: पहला, ब्राज़ील का लाभ मुख्यतः भूगोल है — उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत क्षमताओं में से एक है, जो अकेले 52% बिजली देती है, जबकि भारत का जलविद्युत भंडार सीमित और भौगोलिक रूप से बिखरा हुआ है। दूसरा, भारत की कुल बिजली मांग तेज़ी से बढ़ रही है (आबादी और औद्योगिकीकरण दोनों की वजह से), तो नई नवीकरणीय क्षमता जुड़ने के बावजूद हिस्सेदारी उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ती जितनी दिखनी चाहिए — क्योंकि हर साल कुल आधार (denominator) भी बड़ा हो रहा है। तीसरा, भारत का सौर विस्तार बहुत हालिया है (2025 में अकेले सौर-पवन मिलाकर 14% हिस्सा), इसलिए अभी क्षमता जितनी तेज़ी से बढ़ी है, उतनी तेज़ी से उत्पादन-हिस्सेदारी में तब्दील नहीं हुई — ट्रांसमिशन और बैटरी-भंडारण अड़चनें भी इसमें भूमिका निभाती हैं। दूसरी तरफ, प्रवृत्ति (trend) उत्साहजनक है। 2025 में भारत की जीवाश्म-ईंधन बिजली उत्पादन में वास्तविक गिरावट आई — कोयला जलाने में 2.9% की कमी — यानी बढ़ती मांग को पूरी तरह नवीकरणीय स्रोतों से पूरा किया गया, जो इससे पहले नहीं हुआ था। दिसंबर 2025 तक भारत की स्थापित नवीकरणीय क्षमता 258 गीगावाट तक पहुंच गई, और मौजूदा योजनाओं के आधार पर Ember का अनुमान है कि 2030 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 42% हो सकती है — जो आज के मुकाबले लगभग दोगुनी होगी। यानी भारत की क्षमता-वृद्धि की रफ़्तार वाकई तेज़ है (जैसा इसी वेबसाइट की अलग एंट्री में दिखाया गया है), पर आज की उत्पादन-हिस्सेदारी में यह अभी साफ नहीं झलकती। एक आखिरी ज़रूरी संदर्भ: यह तुलना सिर्फ हिस्सेदारी (%) की है, प्रति-व्यक्ति बिजली खपत की नहीं। भारत की प्रति-व्यक्ति बिजली खपत अमेरिका और जर्मनी से कई गुना कम है, इसलिए प्रति-व्यक्ति उत्सर्जन के लिहाज़ से भारत वैश्विक औसत से काफी नीचे है, भले ही उत्पादन-मिश्रण में जीवाश्म ईंधन का हिस्सा अभी भी बड़ा हो।
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भारत की गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता 50% पार, तय समय से पांच साल पहले — पर बिजली उत्पादन में अब भी कोयले का दबदबा

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