रायमिश्रित राय
भारत ने 124 देशों का जलवायु गठबंधन बनाया। लगभग पूरा बिल अब भी अकेले वही चुका रहा है।
प्रकाशित: 15 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: भारत ने 120 देशों का सौर गठबंधन बनाया — पर यह लगभग पूरी तरह भारत के पैसे पर चलता है
नवंबर 2015 से पहले, धूप-समृद्ध देशों के बीच सौर ऊर्जा तैनाती का समन्वय करने वाला कोई वैश्विक निकाय नहीं था, और किसी भी अंतरराष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन का मुख्यालय कभी भारतीय धरती पर नहीं रहा था। COP21 में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के शुरू होने के साथ यह दोनों बदल गए, और 2025 की असेंबली तक गुरुग्राम में मुख्यालय वाले इस गठबंधन में 124 सदस्य और हस्ताक्षरकर्ता देश शामिल हो चुके थे — यह भारत की उस बढ़ती क्षमता का असली प्रमाण है कि वह अब किसी वैश्विक जलवायु पहल में सिर्फ़ हिस्सा नहीं लेता, बल्कि उसे बुलाता और चलाता भी है। ईमानदार अंतर यह है कि इसे असल में कौन चुका रहा है और कितना काम पूरा हुआ है: 2025 की एक जांच में पाया गया कि गठबंधन की स्वैच्छिक फंडिंग का लगभग 99% अकेले भारत ने दिया, योजनाबद्ध 50 सौर प्रशिक्षण केंद्रों में से सिर्फ़ 11 ही चालू हो पाए, और अफ्रीका-केंद्रित 200 मिलियन डॉलर की फंडिंग सुविधा उसका मुश्किल से एक तिहाई ही जुटा सकी। जनवरी 2026 में जब अमेरिका ने 60 से ज़्यादा अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ इससे बाहर निकलने का फ़ैसला किया, तो गठबंधन को एक और झटका लगा, जो यह उजागर करता है कि ISA अभी भी व्यापक रूप से सह-वित्तपोषित वैश्विक साझेदारी बनने से कितना दूर है, न कि मुख्यतः भारत-वित्तपोषित संगठन। भारत की यह बुलाने और जोड़ने की क्षमता असली है; और यह भी सच है कि काग़ज़ पर 124 देशों को जोड़ना उन 124 देशों के असल में अपना हिस्सा चुकाने जैसा नहीं है।
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